अगर गिद्व जैसा व्यवहार हुआ तो विलुप्त के कगार पर पहुचे जायेगी गैरेया

 हरिद्वार। राष्ट्रीय मानव अधिकार संरक्षण समिति ने विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर वेबिनार का आयोजन किया। जिसमें गौरेया की घटती संख्या पर चिंता जताई गयी। अध्यक्षता करते हुए मानव अधिकार संरक्षण समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष मधुसूदन आर्य ने कहा कि गौरैया के बारे में जागरूकता बढ़ाने और संरक्षण के लिए सर्वप्रथम वर्ष 2010 में विश्व गौरैया दिवस मनाया गया था। गौरैया भारत में पायी जाने वाली एक सामान्य चिड़िया है। लेकिन अंधाधुंध शहरीकरण ने इसे विलुप्त होने के कगार पर पहुंचा दिया है। संरक्षक जगदीश लाल पाहवा ने कहा कि गौरैया के साथ भी कहीं ऐसा न हो जैसा गिद्धों के साथ हुआ, एक दशक पूर्व गिद्ध सामान्यतः दिखाई देते थे, जो अब विलुप्ति के कगार पर हैं। विमल कुमार गर्ग ने कहा कि गौरैया के कम होने का एक संकेत यह भी है कि हमारे आसपास के पर्यावरण में कोई गड़बड़ चल रही है। क्योंकि गौरैया मनुष्य की सहचर है। जहां-जहां मनुष्य होगा, वहीं गौरैया होगी। लोग जहां भी घर बनाते हैं, देर-सबेर गौरैया के जोड़े वहां रहने पहुंच जाते हैं। अगर गौरैया के विलुप्त होने पर हम नहीं चेते, तो भविष्य में गंभीर खामियाजा उठाना पड़ सकता है। आरके गर्ग ने कहा कि गौरैया हमारे पर्यावरण को बेहतर बनाने में योगदान देती है। डॉ. पवन सिंह ने कहा कि पक्षियों का विलुप्त होने का मुख्य कारण टेक्नोलॉजी है। रोजमर्रा की जिंदगी में मनुष्य आए दिन टेक्नोलॉजी के ऊपर आधारित होता चला जा रहा है, फलस्वरूप मानव की बदलती जीवन-शैली ने गौरैया के आवास, भोजन व घोसले बनाने वाले स्थानों को नष्ट कर दिया। साथ ही पेस्टीसाइड के बेतहाशा इस्तेमाल से गौरैया ही क्या मानव आबादी में रहने वाले सभी जीव-जन्तु बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। वेबिनार में जितेन्द्र कुमार, लायन एसआर गुप्ता, जेके शर्मा, सुरेश चन्द्र गुप्ता, गोपाल शर्मा एडवोकेट, कमला जोशी, अन्नपूर्णा बंधुनी, डा अतर सिंह, डा राजीव चतुर्वेदी, डॉ.पंकज कौशिक हेमंत सिंह नेगी, कुलभूषण शर्मा, रेखा नेगी, नीलम रावत, प्रीति जोशी, साधना रावत कंडारी, नुपूर पाल, अनिल कंसल, अरविंद मंगल, शोभा शर्मा, भारती सिंह, अंकुर गोयल, जगदीश बावला आदि मौजूद रहे।